उनके सामने मनाया गया। क्या उन्होंने मराठी गं्रथ की पांडुलिपि के इतिहास पर कहीं कोई प्रकाश डाला? ये सभी प्रश्न पुस्तक के इतिहास को रहस्यपूर्ण बना देते हैं।
1957 में 1857 की क्रांति की शताब्दी के अवसर पर पुनः यह असमंजस खड़ा हुआ कि उस घटना को क्या कहें-गदर, क्रांति या स्वातंत्र्य समर? वरिष्ठ इतिहासकार आर.सी.मजूमदार ने उसे ‘सिपाही विद्रोह’ कहा तो उन्हीं के शिष्य डाॅ, एस.बी.चैधरी ने उसे ‘जन विद्रोह’ का
उनके सामने मनाया गया। क्या उन्होंने मराठी गं्रथ की पांडुलिपि के इतिहास पर कहीं कोई प्रकाश डाला? ये सभी प्रश्न पुस्तक के इतिहास को रहस्यपूर्ण बना देते हैं।
1957 में 1857 की क्रांति की शताब्दी के अवसर पर पुनः यह असमंजस खड़ा हुआ कि उस घटना को क्या कहें-गदर, क्रांति या स्वातंत्र्य समर? वरिष्ठ इतिहासकार आर.सी.मजूमदार ने उसे ‘सिपाही विद्रोह’ कहा तो उन्हीं के शिष्य डाॅ, एस.बी.चैधरी ने उसे ‘जन विद्रोह’ का