उसकी ठिकारियों बना दी। हिंदुस्थान में आज तक किसी भी आंदोलन में इतनी अगुवाई किसानों ने नहीं की जितनी इस सन् 1857 क्रांति-युद्ध में की। अपने पुराने लालुकेदारों (अंगे्रज द्वारा नियुक्त नहीं) के झंडों के नीचे अपने हाथों के हल जहां-के-तहां फेंककर ये किसान हवा की भांति स्वतंत्रता युद्व के लिए दौड़ पड़े। उन्होंने कंपनी से अपना आड़ा-टेढ़ा परंतु स्वराज्य अधिक अच्छा है, यह पक्की तरह से दिख गया थां इसलिए उन्होंने
उसकी ठिकारियों बना दी। हिंदुस्थान में आज तक किसी भी आंदोलन में इतनी अगुवाई किसानों ने नहीं की जितनी इस सन् 1857 क्रांति-युद्ध में की। अपने पुराने लालुकेदारों (अंगे्रज द्वारा नियुक्त नहीं) के झंडों के नीचे अपने हाथों के हल जहां-के-तहां फेंककर ये किसान हवा की भांति स्वतंत्रता युद्व के लिए दौड़ पड़े। उन्होंने कंपनी से अपना आड़ा-टेढ़ा परंतु स्वराज्य अधिक अच्छा है, यह पक्की तरह से दिख गया थां इसलिए उन्होंने