1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

हिंदू और मुसलमान, वृद्ध और तरूण, पुरूष और महिला-सारे-के-सारे राजनीतिक दास्य का उच्छेद करने के लिए ‘हर-हर’ कर उठा। ‘‘केवल गंगा पार के लोग ही नहीं अपितु गंगा और यमुना के मध्य में स्थित भूखंड की जनता भी उठा, किसान भी सन्नद्ध हुए और दोनों धर्मों का एक भी अनुयायी ऐसा नहीं रह गया जो हम (अंगे्रजों) पर प्रहार करने के लिए बेचैन न हो उठा हो।’’ इस बहुजन समाज के प्रचंड प्रयासों को सफलता मिले और श्रीमती भारतभूमि


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हिंदू और मुसलमान, वृद्ध और तरूण, पुरूष और महिला-सारे-के-सारे राजनीतिक दास्य का उच्छेद करने के लिए ‘हर-हर’ कर उठा। ‘‘केवल गंगा पार के लोग ही नहीं अपितु गंगा और यमुना के मध्य में स्थित भूखंड की जनता भी उठा, किसान भी सन्नद्ध हुए और दोनों धर्मों का एक भी अनुयायी ऐसा नहीं रह गया जो हम (अंगे्रजों) पर प्रहार करने के लिए बेचैन न हो उठा हो।’’ इस बहुजन समाज के प्रचंड प्रयासों को सफलता मिले और श्रीमती भारतभूमि


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