उस पूर्वग्रह-युक्त विशाल सामग्री में भी उन्हें ‘सिपाही विद्रोह’ के परदे के भीतर एक सुनियोजित स्वातंत्र्य समर के स्पष्ट दर्शन तथ्यों में से कैसा नया चित्र उभर आता है, इतिहास-लेखन के क्षेत्र में उसका यह अत्युत्तम उदाहरण है। इसीलिए सावरकर की पुस्तक दो-दो स्वातंत्र्य समरों (1814 व 1943) का प्रेरणा-स्त्रोत बन गई।
देवेन्द्र स्वरूप
ओ हुतात्माओं !
स्वतंत्रता संग्राम आरंभ हो एक बार
पिता से पुत्र को पहुंचे बार-बार
उस पूर्वग्रह-युक्त विशाल सामग्री में भी उन्हें ‘सिपाही विद्रोह’ के परदे के भीतर एक सुनियोजित स्वातंत्र्य समर के स्पष्ट दर्शन तथ्यों में से कैसा नया चित्र उभर आता है, इतिहास-लेखन के क्षेत्र में उसका यह अत्युत्तम उदाहरण है। इसीलिए सावरकर की पुस्तक दो-दो स्वातंत्र्य समरों (1814 व 1943) का प्रेरणा-स्त्रोत बन गई।
देवेन्द्र स्वरूप
ओ हुतात्माओं !
स्वतंत्रता संग्राम आरंभ हो एक बार
पिता से पुत्र को पहुंचे बार-बार