1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

उसे देख-देखकर सोल्जर तालियां पीट रहे थे-ऐसे बाप वहां इकट्ठा हो गए थे। जिनका देश बेचिराग हुआ था, जिनका धर्म पैरों से कुचला जाता था जिनके राष्ट्र की स्वतंत्रता छीन ली गई थी-ऐसी बेचैन आत्माएं-इसका प्रतिशोध लेना है-इसका बदला लेना है, ऐसा कहती हुई उस राष्ट्रध्वज के चारों ओर हल्ला-गुल्ला कर रही थी। और अब यह विजय दिवस आने पर भी जब श्रीमंत नाना साहब अंगे्रजों को इलाहाबाद पहुंचा देने का वचन देने लगे तब उन सिपाहियों


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उसे देख-देखकर सोल्जर तालियां पीट रहे थे-ऐसे बाप वहां इकट्ठा हो गए थे। जिनका देश बेचिराग हुआ था, जिनका धर्म पैरों से कुचला जाता था जिनके राष्ट्र की स्वतंत्रता छीन ली गई थी-ऐसी बेचैन आत्माएं-इसका प्रतिशोध लेना है-इसका बदला लेना है, ऐसा कहती हुई उस राष्ट्रध्वज के चारों ओर हल्ला-गुल्ला कर रही थी। और अब यह विजय दिवस आने पर भी जब श्रीमंत नाना साहब अंगे्रजों को इलाहाबाद पहुंचा देने का वचन देने लगे तब उन सिपाहियों


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