में नाना के स्वातंन्न्य तिलक से विभूषित सिंहासन पर विराजमान होने के पश्चात् झांसी में स्वकीय सिंहासनरोहण किए बिना-भूमि पर थोड़े ही बैठेगी। स्वतंत्रता के रण पट पर सिंहासन का भयानक दांव लगाने के लिए नाना साहब ने जिस दिन अपना पासा कानपुर में फेंका उसी दिन रानी ने भी अपना पासा झांसी में फेंका। इसी का नाम है साथी‘गुइयां! 4 जून को इधर कानपुर में स्वातंन्न्य घोषणा की भयानक गड़गड़ाहट होने लगी, तभी उधर झांसी की चपला भी समर आकाश में कड़कने लगी।
में नाना के स्वातंन्न्य तिलक से विभूषित सिंहासन पर विराजमान होने के पश्चात् झांसी में स्वकीय सिंहासनरोहण किए बिना-भूमि पर थोड़े ही बैठेगी। स्वतंत्रता के रण पट पर सिंहासन का भयानक दांव लगाने के लिए नाना साहब ने जिस दिन अपना पासा कानपुर में फेंका उसी दिन रानी ने भी अपना पासा झांसी में फेंका। इसी का नाम है साथी‘गुइयां! 4 जून को इधर कानपुर में स्वातंन्न्य घोषणा की भयानक गड़गड़ाहट होने लगी, तभी उधर झांसी की चपला भी समर आकाश में कड़कने लगी।