स्वराज्य की मंगल सुगंध बहुत दिनों बाद बह रही है। मराठों की जिस गद्दी को रायगढ़ से अंगे्रजों ने धकेला था, वह अंगे्रजी रक्त और मांस से ब्रह्यवर्त में पुनभूर्त हुई हैं।
आज उसके समृद्ध वृक्ष को उसमें स्वराज्य का फल लगा देखकर नाना को क्या लगा होगा?
पर नाना की बालसखी छबीली उधर क्या कर रही है? नाना को घोड़े पर बैठते देख जो घोड़े पर बैठती थी, नाना हाथी पर बैठें तो वह भी हाथी पर बैठे बिना न रहती थी, वह कानपुर
स्वराज्य की मंगल सुगंध बहुत दिनों बाद बह रही है। मराठों की जिस गद्दी को रायगढ़ से अंगे्रजों ने धकेला था, वह अंगे्रजी रक्त और मांस से ब्रह्यवर्त में पुनभूर्त हुई हैं।
आज उसके समृद्ध वृक्ष को उसमें स्वराज्य का फल लगा देखकर नाना को क्या लगा होगा?
पर नाना की बालसखी छबीली उधर क्या कर रही है? नाना को घोड़े पर बैठते देख जो घोड़े पर बैठती थी, नाना हाथी पर बैठें तो वह भी हाथी पर बैठे बिना न रहती थी, वह कानपुर