योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
हंसराज रहबर - राजपाल
अपनी बात
विवेकानंद पर मैंने अपनी पुस्तक लिखना शुरू ही की थी कि वह चर्चा का विषय बन गई ।
‘‘क्या विवेकानन्द को भी बेनकाब करोगे?’’ यह प्रश्न बार-बार पूछा जाता था और पूछा इसलिए जाता था कि मैं इससे पहले ‘गांधी बेनकाब’, ‘नेहरू बेनकाब’ और ‘गालिब बेनकाब’ पुस्तकें लिख चुका हूं। लेकिन प्रश्न का स्वर दो प्रकार का था। एक स्वर उन व्यवस्था से जुडे़ हुए सुविधा-सेवी बुद्विजीवीयों
योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
हंसराज रहबर - राजपाल
अपनी बात
विवेकानंद पर मैंने अपनी पुस्तक लिखना शुरू ही की थी कि वह चर्चा का विषय बन गई ।
‘‘क्या विवेकानन्द को भी बेनकाब करोगे?’’ यह प्रश्न बार-बार पूछा जाता था और पूछा इसलिए जाता था कि मैं इससे पहले ‘गांधी बेनकाब’, ‘नेहरू बेनकाब’ और ‘गालिब बेनकाब’ पुस्तकें लिख चुका हूं। लेकिन प्रश्न का स्वर दो प्रकार का था। एक स्वर उन व्यवस्था से जुडे़ हुए सुविधा-सेवी बुद्विजीवीयों