योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

थी। हर अनुच्छेद की प्रथम और अंतिम पंक्तियां पढ़ते ही उसके भीतर क्या कहा गया है, मैं समझ लेता था। शनैःशनैः वह शक्ति परिपक्व होने पर हर अनुच्छेद पढ़ने का भी प्रयोजन नहीं होता था। हर पृष्ठ की प्रथम और अंतिम पंक्तियां पढ़कर ही मैं आश्य समझ सकता था। फिर पुस्तक के जिस स्थान पर गं्रथकार ने कोई विषय तर्क-युक्तियों द्वारा समझाया है, वहां यदि प्रमाण-प्रयोग की सहायता से किसी की युक्ति के समझाने में 4-5 या उससे अधिक पृष्ठ लगे हो तो


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थी। हर अनुच्छेद की प्रथम और अंतिम पंक्तियां पढ़ते ही उसके भीतर क्या कहा गया है, मैं समझ लेता था। शनैःशनैः वह शक्ति परिपक्व होने पर हर अनुच्छेद पढ़ने का भी प्रयोजन नहीं होता था। हर पृष्ठ की प्रथम और अंतिम पंक्तियां पढ़कर ही मैं आश्य समझ सकता था। फिर पुस्तक के जिस स्थान पर गं्रथकार ने कोई विषय तर्क-युक्तियों द्वारा समझाया है, वहां यदि प्रमाण-प्रयोग की सहायता से किसी की युक्ति के समझाने में 4-5 या उससे अधिक पृष्ठ लगे हो तो


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