ने किसी प्रकार के नये ध्येय की सृष्टि स्वयं नहीं की। केवल सर्वसाधारण जनता का ध्यान इसकी ओर आकर्षित कर दिया था। इसीलिए हिन्दू, मुलमान सब उनको मानते थे। वे शक्ति के साधक थे। भारत के इतिहास में उनके समान विरला ही दृष्टान्त मिलेगा।’ (षष्ट खंड, पृष्ठ 68)
जिस प्रकार गुरू गोविन्दसिंह के ज़माने में भक्ति आंदोलन ने सशस्त्र संघर्ष का रूप धारण किया था, उसी प्रकार अब होने जा रहा था। हिन्दू और मुसलमान सभी फिरंगी के दमन और अत्याचार
ने किसी प्रकार के नये ध्येय की सृष्टि स्वयं नहीं की। केवल सर्वसाधारण जनता का ध्यान इसकी ओर आकर्षित कर दिया था। इसीलिए हिन्दू, मुलमान सब उनको मानते थे। वे शक्ति के साधक थे। भारत के इतिहास में उनके समान विरला ही दृष्टान्त मिलेगा।’ (षष्ट खंड, पृष्ठ 68)
जिस प्रकार गुरू गोविन्दसिंह के ज़माने में भक्ति आंदोलन ने सशस्त्र संघर्ष का रूप धारण किया था, उसी प्रकार अब होने जा रहा था। हिन्दू और मुसलमान सभी फिरंगी के दमन और अत्याचार