योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

में कहीं कोई दया-धर्म अब बचा है कि नहीं ? या कि केवल ‘मुझे छुओ मत’ रह गया है? लात मारकर निकाल बाहर करो इस भ्रष्ट आचरण को समाज से। कितना चाहता हूं कि अस्पृश्ता की दीवारें ढाकर सब ऊंच-नीच को एक में मिलाकर पुकारूं, ‘आओ सब दीन-हीन सर्वहारा, पददलित, विपन्नजन, आओ हम श्री रामकृष्ण की छत्र-छाया में एकत्र होंवे।’ जब तक यह जन नहीं उठेंगे, भारत माता का उद्वार नहीं होगा।’’ (विवेकानन्द, पृष्ठ 148-49)

1901 के दिसम्बर महीने के अंत


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में कहीं कोई दया-धर्म अब बचा है कि नहीं ? या कि केवल ‘मुझे छुओ मत’ रह गया है? लात मारकर निकाल बाहर करो इस भ्रष्ट आचरण को समाज से। कितना चाहता हूं कि अस्पृश्ता की दीवारें ढाकर सब ऊंच-नीच को एक में मिलाकर पुकारूं, ‘आओ सब दीन-हीन सर्वहारा, पददलित, विपन्नजन, आओ हम श्री रामकृष्ण की छत्र-छाया में एकत्र होंवे।’ जब तक यह जन नहीं उठेंगे, भारत माता का उद्वार नहीं होगा।’’ (विवेकानन्द, पृष्ठ 148-49)

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