व्याख्या होनी चाहिए और जिस कारण उन बड़े-बड़े धर्माचार्यों के तिरोभाव के प्रायः एक ही शताब्दी के भीतर वह उन्नति रूक गई, उसकी भी व्याख्या करनी होगी। इसका रहस्य यह है-उन्होंने नीची जातियों को उठाया था, वे सब चाहते थे कि यह उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर आरूढ़ हो जायें, परन्तु उन्होंने जनता में संस्कृत का प्रचार करने में अपनी शक्ति नहीं लगाई? संस्कृति ही युग के आघातों को सहन कर सकती है, मात्र-ज्ञान-राशि नहीं। तुम संसार के सामने प्रभु ज्ञान रख सकते हो,
व्याख्या होनी चाहिए और जिस कारण उन बड़े-बड़े धर्माचार्यों के तिरोभाव के प्रायः एक ही शताब्दी के भीतर वह उन्नति रूक गई, उसकी भी व्याख्या करनी होगी। इसका रहस्य यह है-उन्होंने नीची जातियों को उठाया था, वे सब चाहते थे कि यह उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर आरूढ़ हो जायें, परन्तु उन्होंने जनता में संस्कृत का प्रचार करने में अपनी शक्ति नहीं लगाई? संस्कृति ही युग के आघातों को सहन कर सकती है, मात्र-ज्ञान-राशि नहीं। तुम संसार के सामने प्रभु ज्ञान रख सकते हो,