शिक्षा देनी होगी। साथ ही संस्कृत की शिक्षा भी अवश्य होती रहनी चाहिए, क्योंकि संस्कृत शब्दों की ध्वनि मात्र ही से जाति को एक प्रकार का गौरव, शक्ति और बल प्राप्त हो जाता है। महान रामानुज, चैतन्य और कबीर ने भारत की नीची जातियों को उठाने का जो प्रयत्न किया था, उसमें उन महान धर्माचार्यों को अपने ही जीवन काल में अद्भुत सफलता मिली थी। किन्तु फिर उनके बाद उस कार्य का जो शोचनीय परिणाम हुआ,
224 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
उसकी
शिक्षा देनी होगी। साथ ही संस्कृत की शिक्षा भी अवश्य होती रहनी चाहिए, क्योंकि संस्कृत शब्दों की ध्वनि मात्र ही से जाति को एक प्रकार का गौरव, शक्ति और बल प्राप्त हो जाता है। महान रामानुज, चैतन्य और कबीर ने भारत की नीची जातियों को उठाने का जो प्रयत्न किया था, उसमें उन महान धर्माचार्यों को अपने ही जीवन काल में अद्भुत सफलता मिली थी। किन्तु फिर उनके बाद उस कार्य का जो शोचनीय परिणाम हुआ,
224 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
उसकी