विवेकानन्द संस्कृत को फिर से जीवित भाषा बनाने अथवा उसे राष्ट्रभाषा बनाने की बात नहीं कहते थे बल्कि वे कहते थे, ‘‘संस्कृत में पांडित्य होने ही से भारत में सम्मान प्राप्त होता है। संस्कृत भाषा का ज्ञान होने ही से कोई भी तुम्हारे विरूद्व कुछ कहने का साहस न करेगा। यही एक मात्र रहस्य है, अतः इसे जान लो और संस्कृत पढ़ो।’’ (वही, पृष्ठ 119)
एक मात्र रहस्य की यह बात विवेकानन्द ने अपने अनुभव के आधार पर कही है। उन्होंने संस्कृत
विवेकानन्द संस्कृत को फिर से जीवित भाषा बनाने अथवा उसे राष्ट्रभाषा बनाने की बात नहीं कहते थे बल्कि वे कहते थे, ‘‘संस्कृत में पांडित्य होने ही से भारत में सम्मान प्राप्त होता है। संस्कृत भाषा का ज्ञान होने ही से कोई भी तुम्हारे विरूद्व कुछ कहने का साहस न करेगा। यही एक मात्र रहस्य है, अतः इसे जान लो और संस्कृत पढ़ो।’’ (वही, पृष्ठ 119)
एक मात्र रहस्य की यह बात विवेकानन्द ने अपने अनुभव के आधार पर कही है। उन्होंने संस्कृत