योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

दिन नरेन्द्र ने देखा कि वह रामकृष्ण के पीछे-पीछे मंदिर में जाकर देवमूर्तियों को प्रणाम कर रहा है। नरेन्द्र का पारा चढ़ गया। उसने राखाल पर प्रतिज्ञा भंग करने का दोष लगाया और उसे मिथ्याचारी कहा। राखाल ने अप्रतिभ होकर गर्दन झुका ली। उससे कहते न बन पड़ा। लेकिन रामकृष्ण ने उसका पक्ष लेकर नरेन्द्र से कहा, ‘‘उसकेा यदि अब साकार में भक्ति हो, तो वह क्या करेगा? तुम्हें अच्छा न लगे, तो तुम न करो। पर इस प्रकार दूसरों का भाव नष्ट करने का तुम्हें क्या अधिकार है?’’


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दिन नरेन्द्र ने देखा कि वह रामकृष्ण के पीछे-पीछे मंदिर में जाकर देवमूर्तियों को प्रणाम कर रहा है। नरेन्द्र का पारा चढ़ गया। उसने राखाल पर प्रतिज्ञा भंग करने का दोष लगाया और उसे मिथ्याचारी कहा। राखाल ने अप्रतिभ होकर गर्दन झुका ली। उससे कहते न बन पड़ा। लेकिन रामकृष्ण ने उसका पक्ष लेकर नरेन्द्र से कहा, ‘‘उसकेा यदि अब साकार में भक्ति हो, तो वह क्या करेगा? तुम्हें अच्छा न लगे, तो तुम न करो। पर इस प्रकार दूसरों का भाव नष्ट करने का तुम्हें क्या अधिकार है?’’


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