नहीं तो ऐसी बातें वे कैसे लिख पाते?’’ रामकृष्ण मृदु मुस्कान होंठों पर लाकर शान्त भाव से उत्तर देते, ‘‘तू इस समय उनकी बातें न लेना चाहे तो न ले, पर ऋषि-मुनियों की निंदा क्यों करता है? तू सत्य स्वरूप भगवान को पुकारता चल, उसके बाद वे जिस रूप में तेरे सामने प्रकट होंगे, उसी पर विश्वास कर लेना।’’
राखालचन्द घोष नरेन्द्र के साथ ही ब्रह्मसमाज का सदस्य बना था। अब नरेन्द्र से कुछ दिन पहले ही वह दक्षिणेश्वर आने-जाने लगा था। एक
नहीं तो ऐसी बातें वे कैसे लिख पाते?’’ रामकृष्ण मृदु मुस्कान होंठों पर लाकर शान्त भाव से उत्तर देते, ‘‘तू इस समय उनकी बातें न लेना चाहे तो न ले, पर ऋषि-मुनियों की निंदा क्यों करता है? तू सत्य स्वरूप भगवान को पुकारता चल, उसके बाद वे जिस रूप में तेरे सामने प्रकट होंगे, उसी पर विश्वास कर लेना।’’
राखालचन्द घोष नरेन्द्र के साथ ही ब्रह्मसमाज का सदस्य बना था। अब नरेन्द्र से कुछ दिन पहले ही वह दक्षिणेश्वर आने-जाने लगा था। एक