उन्मत की तरह ताकते हुए नरेन्द्रनाथ खड़े हैं। महर्षि को थोड़ी देर के लिए भी सोच-विचार या प्रश्न करने का अवसर न दे वे आवेगरूद्व कंठ से बोल उठे ‘महाशय, क्या आपने ईश्वर के दर्शन किए हैं?’ विस्मयचकित महर्षि ने न जाने क्या उत्तर देने के लिए दो बार चेष्टा की, परन्तु शब्द मुख ही में रह गए। अंत में बोले, ‘नरेन्द्र, तुम्हारी आंखें देखकर समझ रहा हूं कि तुम योगी हो।’ उन्होंने नरेन्द्र को कई तरह के आश्वासन देकर कहा कि वे यदि नियमित
उन्मत की तरह ताकते हुए नरेन्द्रनाथ खड़े हैं। महर्षि को थोड़ी देर के लिए भी सोच-विचार या प्रश्न करने का अवसर न दे वे आवेगरूद्व कंठ से बोल उठे ‘महाशय, क्या आपने ईश्वर के दर्शन किए हैं?’ विस्मयचकित महर्षि ने न जाने क्या उत्तर देने के लिए दो बार चेष्टा की, परन्तु शब्द मुख ही में रह गए। अंत में बोले, ‘नरेन्द्र, तुम्हारी आंखें देखकर समझ रहा हूं कि तुम योगी हो।’ उन्होंने नरेन्द्र को कई तरह के आश्वासन देकर कहा कि वे यदि नियमित