हमारा’ (1905 और) ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ इसी आध्यात्मिक विजय से प्रेरित होकर लिखे गए। सारांश यह कि विवेकानन्द को स्वामी या धार्मिक कहकर उनकी अवहेलना करना, छिलके के साथ गूदे को-अपनी राष्ट्रीय परम्परा को अलग फेंक देने की भूल करना है, और वह हमने की।
अब यहां अपने राष्ट्रीय बुर्जवा और उनके सर्वश्रेष्ठ प्रवक्ता विवेकानन्द के अंतर्विरोधों पर बहस करने की गुंजाइश नहीं। इतना ही कह देना काफी होगा कि बुर्जवा ने अपने वर्ग स्वभाव
हमारा’ (1905 और) ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ इसी आध्यात्मिक विजय से प्रेरित होकर लिखे गए। सारांश यह कि विवेकानन्द को स्वामी या धार्मिक कहकर उनकी अवहेलना करना, छिलके के साथ गूदे को-अपनी राष्ट्रीय परम्परा को अलग फेंक देने की भूल करना है, और वह हमने की।
अब यहां अपने राष्ट्रीय बुर्जवा और उनके सर्वश्रेष्ठ प्रवक्ता विवेकानन्द के अंतर्विरोधों पर बहस करने की गुंजाइश नहीं। इतना ही कह देना काफी होगा कि बुर्जवा ने अपने वर्ग स्वभाव