एकाएक उन्हें दक्षिणेश्वर के उस अद्भुत प्रेमिक की बात स्मरण हो आई। सारी रात असहनीय उत्कंठा में बिताकर नरेन्द्र भोर होते ही दक्षिणेश्वर की ओर दौड़ पड़े। गुरूदेव के श्री चरण कमलों के पास पहंुचकर उन्होंने देखा, सदानन्दमय महापुरूष भक्तों में घिरे
43 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
हुए अमृत मधुर उपदेश प्रदान कर रहे हैं।
‘‘नरेन्द्र के हृदय में मानो समुद्र मंथन आरम्भ हुआ। यदि वे भी ‘नहीं, कह दें, तो फिर क्या होगा? वे फिर किसके
एकाएक उन्हें दक्षिणेश्वर के उस अद्भुत प्रेमिक की बात स्मरण हो आई। सारी रात असहनीय उत्कंठा में बिताकर नरेन्द्र भोर होते ही दक्षिणेश्वर की ओर दौड़ पड़े। गुरूदेव के श्री चरण कमलों के पास पहंुचकर उन्होंने देखा, सदानन्दमय महापुरूष भक्तों में घिरे
43 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
हुए अमृत मधुर उपदेश प्रदान कर रहे हैं।
‘‘नरेन्द्र के हृदय में मानो समुद्र मंथन आरम्भ हुआ। यदि वे भी ‘नहीं, कह दें, तो फिर क्या होगा? वे फिर किसके