योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

सबने इस संकट में मुंह फेर लिया। नरेन्द्र ही अब परिवार में सबसे बड़ा था, इसलिए आजीविका का भार उसी पर आ पड़ा। इसके लिए जो दोड़-धूप करनी पड़ी और उन दिनों उसकी जो मानसिक दशा थी उसका नरेन्द्र ने स्वयं विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। उसका कुछ अंश रोमां रोलां ने इस प्रकार उद्वत किया हैः

‘‘मैं भूख से मरा जा रहा था। नंगे पैर मैं एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक दौड़ता, परन्तु सब तरफ से घृणा के अतिरिक्त और कुछ न मिलता। मैंने मनुष्य की सहानुभूति


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सबने इस संकट में मुंह फेर लिया। नरेन्द्र ही अब परिवार में सबसे बड़ा था, इसलिए आजीविका का भार उसी पर आ पड़ा। इसके लिए जो दोड़-धूप करनी पड़ी और उन दिनों उसकी जो मानसिक दशा थी उसका नरेन्द्र ने स्वयं विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। उसका कुछ अंश रोमां रोलां ने इस प्रकार उद्वत किया हैः

‘‘मैं भूख से मरा जा रहा था। नंगे पैर मैं एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक दौड़ता, परन्तु सब तरफ से घृणा के अतिरिक्त और कुछ न मिलता। मैंने मनुष्य की सहानुभूति


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