से जुड़ी हुई जनता इसे सहज में ग्रहण कर लेगी और क्रांतिकारी भौतिक शक्ति में बदल सकेगी।
यही सब सोचकर मैंने ‘योद्धा सन्यासी विवेकानन्द’ पुस्तक लिखना शुरू की। अब सवाल यह है कि जब हमारे देश के अधिकांश माक्र्सवादी विवेकानन्द की अवहेलना करते हैं और हिंदू धर्म को घोर प्रतिक्रियावादी धर्म बताते हैं, मेरी यह समझ कैसे बनी?
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के नियम के अनुसार साहित्य, दर्शन तथा
राजनीतिक-किसी भी क्षेत्र में सही समझ गलत समझ
से जुड़ी हुई जनता इसे सहज में ग्रहण कर लेगी और क्रांतिकारी भौतिक शक्ति में बदल सकेगी।
यही सब सोचकर मैंने ‘योद्धा सन्यासी विवेकानन्द’ पुस्तक लिखना शुरू की। अब सवाल यह है कि जब हमारे देश के अधिकांश माक्र्सवादी विवेकानन्द की अवहेलना करते हैं और हिंदू धर्म को घोर प्रतिक्रियावादी धर्म बताते हैं, मेरी यह समझ कैसे बनी?
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के नियम के अनुसार साहित्य, दर्शन तथा
राजनीतिक-किसी भी क्षेत्र में सही समझ गलत समझ