के साथ संघर्ष में विकसित होती है। प्रगतिशील साहित्यक आंदोलन और कम्युनिष्ट पार्टी में मैंने प्रवृत्िायों के विरूद्व जो संघर्ष किया उसी के परिणाम-स्वरूप मेरी यह समझ बनी है। संझर्ष औरों ने भी किया और इसी के परिणामस्वरूप संसदीय मार्ग छोड़ देने वाले क्रांतिकारी तत्वों ने तीसरी कम्युनिष्ट पार्टी (माक्र्सवादी-लेनिनवादी) बनाई। और मैंने स्वभावतः उनका साथ दिया। लेकिन जब कलकत्ता में विवेकानन्द और विद्यासागर इत्यादि की मूर्तियां तोड़ी
के साथ संघर्ष में विकसित होती है। प्रगतिशील साहित्यक आंदोलन और कम्युनिष्ट पार्टी में मैंने प्रवृत्िायों के विरूद्व जो संघर्ष किया उसी के परिणाम-स्वरूप मेरी यह समझ बनी है। संझर्ष औरों ने भी किया और इसी के परिणामस्वरूप संसदीय मार्ग छोड़ देने वाले क्रांतिकारी तत्वों ने तीसरी कम्युनिष्ट पार्टी (माक्र्सवादी-लेनिनवादी) बनाई। और मैंने स्वभावतः उनका साथ दिया। लेकिन जब कलकत्ता में विवेकानन्द और विद्यासागर इत्यादि की मूर्तियां तोड़ी