वे उसी में संतुष्ट रहते थे। अपने अभाव की बात उन्होंने कभी सुरेन्द्र मित्र से जाकर नहीं कही। थाली, बर्तन आदि कुछ न था। उबाले हुए कुंदरव के पत्ो और भात, अरबी के पत्तों पर रखकर खाते थे। इसके बावजुद पूजा, ध्यान, जप बराबर चलता रहता था, उत्साह में भरकर कीर्तन शुरू करते तो बाहर सुनने वालों की भीड़ लग जाती।
कई बार गृहस्थ भक्त भी वराहनगर के इस मठ में आते। अपने गुरू-भाइयों के साथ रामकृष्ण के जीवन और धर्म-संबंधी चर्चा करते। लेकिन
वे उसी में संतुष्ट रहते थे। अपने अभाव की बात उन्होंने कभी सुरेन्द्र मित्र से जाकर नहीं कही। थाली, बर्तन आदि कुछ न था। उबाले हुए कुंदरव के पत्ो और भात, अरबी के पत्तों पर रखकर खाते थे। इसके बावजुद पूजा, ध्यान, जप बराबर चलता रहता था, उत्साह में भरकर कीर्तन शुरू करते तो बाहर सुनने वालों की भीड़ लग जाती।
कई बार गृहस्थ भक्त भी वराहनगर के इस मठ में आते। अपने गुरू-भाइयों के साथ रामकृष्ण के जीवन और धर्म-संबंधी चर्चा करते। लेकिन