अक्सर इधर-उधर के अपरिचित व्यक्ति भी कौतुलवश मठ में चले आते। वे इन तरूण संन्यासियों से तर्क करते, उनकी परीक्षा लेते और कुछ ऐसे होते जो हंसी-ठिठोली और अशिष्ट आलोचना से भी ब़ाज न आते। इसके अलावा इन युवकों के अभिभावक इन्हें समझा-बुझाकर घर लौटा ले जाने के लिए मठ में आते। वे उन्हें गृहस्थाश्रम की श्रेष्ठता और उज्जवल भविष्य के सब्ज़बाग दिखाते। विवेकानन्द ने इस परिस्थिति का उल्लेख ‘मेरा जीवन और ध्येय’ भाषण में इस प्रकार किया हैः
अक्सर इधर-उधर के अपरिचित व्यक्ति भी कौतुलवश मठ में चले आते। वे इन तरूण संन्यासियों से तर्क करते, उनकी परीक्षा लेते और कुछ ऐसे होते जो हंसी-ठिठोली और अशिष्ट आलोचना से भी ब़ाज न आते। इसके अलावा इन युवकों के अभिभावक इन्हें समझा-बुझाकर घर लौटा ले जाने के लिए मठ में आते। वे उन्हें गृहस्थाश्रम की श्रेष्ठता और उज्जवल भविष्य के सब्ज़बाग दिखाते। विवेकानन्द ने इस परिस्थिति का उल्लेख ‘मेरा जीवन और ध्येय’ भाषण में इस प्रकार किया हैः