योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

मैं उनकी मां को मां कहता हूं। मेरा सब सामान उन्हीं के घर में है। मैं कहीं भी जांऊ, वे उसकी देखभाल करती हैं। यहां के सब लड़के बचपन ही से रोज़गार में लग जाते हैं और लड़कियां विश्वविद्यालय में पढ़ती-लिखती हैं, इसलिए यहां सभाओं में 90 फीसदी स्त्रियां रहती हैं, उनके आगे लड़कों की दाल नहीं गलती।’’

मजे़ की बात यह है कि अमेरिका के आज से अस्सी बरस पहले के सामाजिक जीवन का यह जीवन चित्रण एक संन्यासी ने किया है और इसी पत्र में आगे लिखा है:


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मैं उनकी मां को मां कहता हूं। मेरा सब सामान उन्हीं के घर में है। मैं कहीं भी जांऊ, वे उसकी देखभाल करती हैं। यहां के सब लड़के बचपन ही से रोज़गार में लग जाते हैं और लड़कियां विश्वविद्यालय में पढ़ती-लिखती हैं, इसलिए यहां सभाओं में 90 फीसदी स्त्रियां रहती हैं, उनके आगे लड़कों की दाल नहीं गलती।’’

मजे़ की बात यह है कि अमेरिका के आज से अस्सी बरस पहले के सामाजिक जीवन का यह जीवन चित्रण एक संन्यासी ने किया है और इसी पत्र में आगे लिखा है:


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