में ‘खुले दरवाज़े’ का सिद्वांत इसी नीति का परिणाम था। जो अमेरिका डालर शाह अपने और दूसरे देशों की मेहनतकश जनता का खून चूसकर अपनी तिजोरियां भर रहे थे, उनमंे भारत की अपढ़ गरीब जनता को ऐहिक शिक्षा देने के लिए आर्थिक सहायता पाने की आशा कैसे की जा सकती थी। वे तो धार्मिक रूढ़िवाद ही को बढ़ावा दे सकते थे और दे रहे हैं।
अपने एक धनी मित्र लेगेट के साथ विवेकानन्द 23 अगस्त को न्यूयार्क से पेरिस पहुंचे। कला, संस्कृति तथा भोग-विलास के
में ‘खुले दरवाज़े’ का सिद्वांत इसी नीति का परिणाम था। जो अमेरिका डालर शाह अपने और दूसरे देशों की मेहनतकश जनता का खून चूसकर अपनी तिजोरियां भर रहे थे, उनमंे भारत की अपढ़ गरीब जनता को ऐहिक शिक्षा देने के लिए आर्थिक सहायता पाने की आशा कैसे की जा सकती थी। वे तो धार्मिक रूढ़िवाद ही को बढ़ावा दे सकते थे और दे रहे हैं।
अपने एक धनी मित्र लेगेट के साथ विवेकानन्द 23 अगस्त को न्यूयार्क से पेरिस पहुंचे। कला, संस्कृति तथा भोग-विलास के