योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

वे दल के दल आते हैं और इतने लोगों को बैठाने का मेरे पास स्थान भी नहीं रहता, इसलिए वे सब लोग यहां तक कि स्त्रियां भी, पालथी मारकर ज़मीन पर बैठती है। मैं उनसे कहता हूं कि वे यह कल्पना करने का यत्न करें कि वे भारत के गगन मंडल के नीचे एक फेले हुए वट-वृक्ष की छाया तले बैठे हैं, और उन्हें यह विचार अच्छा

87 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

के नीचे एक फेले हुए वट-वृक्ष की छाया तले बैठे हैं, और उन्हें यह विचार अच्छा लगता है।’’

अंगे्रजी


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वे दल के दल आते हैं और इतने लोगों को बैठाने का मेरे पास स्थान भी नहीं रहता, इसलिए वे सब लोग यहां तक कि स्त्रियां भी, पालथी मारकर ज़मीन पर बैठती है। मैं उनसे कहता हूं कि वे यह कल्पना करने का यत्न करें कि वे भारत के गगन मंडल के नीचे एक फेले हुए वट-वृक्ष की छाया तले बैठे हैं, और उन्हें यह विचार अच्छा

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के नीचे एक फेले हुए वट-वृक्ष की छाया तले बैठे हैं, और उन्हें यह विचार अच्छा लगता है।’’

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