योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

वाणी में उत्तर देते और साथ ही चुटकी भी लेते थे। 27 दिसम्बर के अंतिम अधिवेशन में उनका भाषण, चाहे स्वागत भाषण की तरह संक्षिप्त था, पर शैली यही थी: ‘‘इस प्रबुद्व श्रोता मंडल को मेरा धन्यवाद, जिसने मुझ पर अविकल कृपा रखी है और जिसने मत-मतान्तरों के मनोमालिन्य को हल्का करने का प्रयत्न करने वाले प्रत्येक विचार का सत्कार किया है। इस समसुरता में कुछ बेसुरे स्वर भी बीच-बीच में सुने गए हैं। उन्हें मेरा विशेष धन्यवाद, क्योंकि उन्होंने


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वाणी में उत्तर देते और साथ ही चुटकी भी लेते थे। 27 दिसम्बर के अंतिम अधिवेशन में उनका भाषण, चाहे स्वागत भाषण की तरह संक्षिप्त था, पर शैली यही थी: ‘‘इस प्रबुद्व श्रोता मंडल को मेरा धन्यवाद, जिसने मुझ पर अविकल कृपा रखी है और जिसने मत-मतान्तरों के मनोमालिन्य को हल्का करने का प्रयत्न करने वाले प्रत्येक विचार का सत्कार किया है। इस समसुरता में कुछ बेसुरे स्वर भी बीच-बीच में सुने गए हैं। उन्हें मेरा विशेष धन्यवाद, क्योंकि उन्होंने


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