योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

अपने स्वर वैचित्य से इस समरसता को और भी मधुर बना दिया है।’’

यह छिछले तथा निकृष्ट पादरियों पर कटु व्यंग्य था फिर रामकृष्ण परमहंस का ‘जितने मत उतने पथ’ और तमाम धर्मों, सम्प्रदायों तथा मतवादों की एकता के सार्वभौम संदेश का पश्चिम की वैज्ञानिक चेतना से सामंजस्य स्ािापित करते हुए आचार्य के स्वर में विवेकानन्द ने कहा:

‘‘बीज भूमि में बो दिया गया और मिट्टी, जल तथा वायु उसके चारों ओर रख दिए गए, तो क्या वह बीज मिट्टी हो जाता है,


463 of 1197

अपने स्वर वैचित्य से इस समरसता को और भी मधुर बना दिया है।’’

यह छिछले तथा निकृष्ट पादरियों पर कटु व्यंग्य था फिर रामकृष्ण परमहंस का ‘जितने मत उतने पथ’ और तमाम धर्मों, सम्प्रदायों तथा मतवादों की एकता के सार्वभौम संदेश का पश्चिम की वैज्ञानिक चेतना से सामंजस्य स्ािापित करते हुए आचार्य के स्वर में विवेकानन्द ने कहा:

‘‘बीज भूमि में बो दिया गया और मिट्टी, जल तथा वायु उसके चारों ओर रख दिए गए, तो क्या वह बीज मिट्टी हो जाता है,


463 of 1197