योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

अमेरिका में उन्होंने अपने जो बहुत से शिष्य बनाए थे, एक-दो को छोड़कर, वे सब खोटे सिक्के साबित हुए। अप्रैल, 1896 में विवेकानन्द फिर इंग्लैंड आए और साल के अंत में स्वदेश लौटने तक वहीं रहे। यहां भारत को समझने वाले मैक्समूलर सरीखे विद्वानों से उनकी भेंट हुई। मैक्समूलर ने उनसे भेंट के बाद रामकृष्ण परमहंस पर एक लेख और फिर पुस्तक लिखी। यहां मिशनरियों ने उनका विरोध नहीं किया। अलबत्ता लन्दन में उनसे किसी ने प्रश्न किया, ‘‘आपके पूर्वज


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अमेरिका में उन्होंने अपने जो बहुत से शिष्य बनाए थे, एक-दो को छोड़कर, वे सब खोटे सिक्के साबित हुए। अप्रैल, 1896 में विवेकानन्द फिर इंग्लैंड आए और साल के अंत में स्वदेश लौटने तक वहीं रहे। यहां भारत को समझने वाले मैक्समूलर सरीखे विद्वानों से उनकी भेंट हुई। मैक्समूलर ने उनसे भेंट के बाद रामकृष्ण परमहंस पर एक लेख और फिर पुस्तक लिखी। यहां मिशनरियों ने उनका विरोध नहीं किया। अलबत्ता लन्दन में उनसे किसी ने प्रश्न किया, ‘‘आपके पूर्वज


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