योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

अगर मावन समाज को धर्म दान के लिए इतने उत्सुक थे तो वे इस देश में धर्म प्रचार करने क्यों नहीं आए?’’ स्वामी जी ने मृदुभाव से मुस्कराते हुए चट से उत्तर दिया, ‘‘उस समय तुम्हारे पूर्वज तो जंगली बर्बर थे, पत्तों के हरे रंग से अपने उलंग शरीर को रंगकर पर्वतों की गुफाओं में रहते थे-वे कहां धर्म प्रचार करने आते?’’

वैसे इंग्लैंडवासियों से उन्हें कोई शिकायत नहीं थी, फ्रैंसिस लेंगेट के नाम पत्र में लिखते हैं, ‘‘इंग्लैंड में यह कार्य चुपचाप,


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अगर मावन समाज को धर्म दान के लिए इतने उत्सुक थे तो वे इस देश में धर्म प्रचार करने क्यों नहीं आए?’’ स्वामी जी ने मृदुभाव से मुस्कराते हुए चट से उत्तर दिया, ‘‘उस समय तुम्हारे पूर्वज तो जंगली बर्बर थे, पत्तों के हरे रंग से अपने उलंग शरीर को रंगकर पर्वतों की गुफाओं में रहते थे-वे कहां धर्म प्रचार करने आते?’’

वैसे इंग्लैंडवासियों से उन्हें कोई शिकायत नहीं थी, फ्रैंसिस लेंगेट के नाम पत्र में लिखते हैं, ‘‘इंग्लैंड में यह कार्य चुपचाप,


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