करके अपने अतीत की रक्षा की और उसमें गर्व का अनुभव किया। दूसरी तरफ इसे सनातन वैदेशिक नीति बनाकर गृह-विवाद मिटाने और एक अखंड जाति के रूप में संगठित होने का प्रयत्न किया।
पश्चिम के पूंजीवाद ने जब साम्राज्यवाद का रूप धारण किया तो वह सैन्य और औद्यिगिक सभ्यता मंे तो श्रेष्ठ था ही, लेकिन विजित जातियों को मानसिक रूप से निहत्था करने के लिए अपने धर्म को भी उनके धर्म से श्रेष्ठ बताया और ईसाइयत को ‘विश्व धर्म’ का सिद्वान्त उन्हीं
करके अपने अतीत की रक्षा की और उसमें गर्व का अनुभव किया। दूसरी तरफ इसे सनातन वैदेशिक नीति बनाकर गृह-विवाद मिटाने और एक अखंड जाति के रूप में संगठित होने का प्रयत्न किया।
पश्चिम के पूंजीवाद ने जब साम्राज्यवाद का रूप धारण किया तो वह सैन्य और औद्यिगिक सभ्यता मंे तो श्रेष्ठ था ही, लेकिन विजित जातियों को मानसिक रूप से निहत्था करने के लिए अपने धर्म को भी उनके धर्म से श्रेष्ठ बताया और ईसाइयत को ‘विश्व धर्म’ का सिद्वान्त उन्हीं