योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

और परम्परा इन्हीें संस्थाओं के माध्यम से विकसित होती है और उन्हीं में सुरक्षित रहती है। जब भौतिक उन्नति रूक जाने से संस्कृति और परम्परा का विकास रूक जाता है, तो इन धार्मिक संस्थाओं को नष्ट करने का और मंागे हुए विदेशी विचारों को, चाहे वे कितने ही उन्नत, श्रेष्ठ, तर्कसंगत तथा वैज्ञानिक ही क्यों न हों, ऊपर से लाद देने का प्रयास हितकर नहीं, अहितकर है; क्यों सुधार और क्रान्ति के नाम पर किए गए इस प्रयास का परिणाम होगा, अपने इतिहास और परम्परा को मिटाना,


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और परम्परा इन्हीें संस्थाओं के माध्यम से विकसित होती है और उन्हीं में सुरक्षित रहती है। जब भौतिक उन्नति रूक जाने से संस्कृति और परम्परा का विकास रूक जाता है, तो इन धार्मिक संस्थाओं को नष्ट करने का और मंागे हुए विदेशी विचारों को, चाहे वे कितने ही उन्नत, श्रेष्ठ, तर्कसंगत तथा वैज्ञानिक ही क्यों न हों, ऊपर से लाद देने का प्रयास हितकर नहीं, अहितकर है; क्यों सुधार और क्रान्ति के नाम पर किए गए इस प्रयास का परिणाम होगा, अपने इतिहास और परम्परा को मिटाना,


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