विकृत करना अथवा त्याग देना। अपने अतीत और परम्परा कट जाने के बाद मनुष्य, मनुष्य न रहकर बेरीढ़ के प्राणी में परिणित हो जाता है। उसके देश भक्त अथवा क्रान्तिकारी बनने का सवाल ही पैदा नहीं होता। अतएव विवेकानन्द ने कहा कि इन मांगे हुए विचारों पर पलने वाले तथाकथित देशभक्तों और सुधारकों को तो यह भी मालूम नहीं कि घाव कहां है, ये लोग मूर्ति-पूजा, विधवा-विवाह और बाल-विवाह आदि गौण बातों को लेकर चिल्ल-पौं मचा रहे हैं। विवेकानन्द ने
विकृत करना अथवा त्याग देना। अपने अतीत और परम्परा कट जाने के बाद मनुष्य, मनुष्य न रहकर बेरीढ़ के प्राणी में परिणित हो जाता है। उसके देश भक्त अथवा क्रान्तिकारी बनने का सवाल ही पैदा नहीं होता। अतएव विवेकानन्द ने कहा कि इन मांगे हुए विचारों पर पलने वाले तथाकथित देशभक्तों और सुधारकों को तो यह भी मालूम नहीं कि घाव कहां है, ये लोग मूर्ति-पूजा, विधवा-विवाह और बाल-विवाह आदि गौण बातों को लेकर चिल्ल-पौं मचा रहे हैं। विवेकानन्द ने