योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

पृष्ठ 117)

वैदिक युग के बाद जब मुनष्य को प्रकृति के विरूद्व अपने संघर्ष में कुछ फुरसत मिली, सांस लेने और सोचने की सुविधा प्राप्त हुई, तभी उसने आत्मा और परमात्मा का निर्माण किया। देखना यह है कि मनुष्य की इस सोच का-आत्मा और परमात्मा के निर्माण का आधार क्या है? विवेकानन्द ‘मनुष्य का यथार्थ स्वरूप’ भाषण में कहते हैं:

‘‘कवित्वमय कठोरपनिषद् के प्रारम्भ में हम यह प्रश्न करते हैं-कोई लोग कहते हैं कि मनुष्य के मरने पर उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है,


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वैदिक युग के बाद जब मुनष्य को प्रकृति के विरूद्व अपने संघर्ष में कुछ फुरसत मिली, सांस लेने और सोचने की सुविधा प्राप्त हुई, तभी उसने आत्मा और परमात्मा का निर्माण किया। देखना यह है कि मनुष्य की इस सोच का-आत्मा और परमात्मा के निर्माण का आधार क्या है? विवेकानन्द ‘मनुष्य का यथार्थ स्वरूप’ भाषण में कहते हैं:

‘‘कवित्वमय कठोरपनिषद् के प्रारम्भ में हम यह प्रश्न करते हैं-कोई लोग कहते हैं कि मनुष्य के मरने पर उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है,


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