योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

की इच्छा भी उन्हीं के मन में उत्पन्न हुई। अतएव इस परिवर्तनशील जगत् से परे अपरिवर्तित की कल्पना भी उन्होंने ही की’। लिखा है:

‘‘इसके बाद मृत्यु रूपी भयानक तथ्य आता है, सारा संसार मृत्यु के मुख में चला जा रहा है, सभी मरते जा रहे हैं। हमारी उन्नति हमारे व्यर्थ के आडम्बरपूर्ण कार्य-कलाप, समाज-संस्कार, विलासिता-ऐश्वर्य, ज्ञान-इन सबकी मृत्यु ही एकमात्र गति है। इससे अधिक निश्चित बात और कुछ नहीं। नगर पर नगर बनते हैं और नष्ट हो जाते हैं,


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की इच्छा भी उन्हीं के मन में उत्पन्न हुई। अतएव इस परिवर्तनशील जगत् से परे अपरिवर्तित की कल्पना भी उन्होंने ही की’। लिखा है:

‘‘इसके बाद मृत्यु रूपी भयानक तथ्य आता है, सारा संसार मृत्यु के मुख में चला जा रहा है, सभी मरते जा रहे हैं। हमारी उन्नति हमारे व्यर्थ के आडम्बरपूर्ण कार्य-कलाप, समाज-संस्कार, विलासिता-ऐश्वर्य, ज्ञान-इन सबकी मृत्यु ही एकमात्र गति है। इससे अधिक निश्चित बात और कुछ नहीं। नगर पर नगर बनते हैं और नष्ट हो जाते हैं,


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