की इच्छा भी उन्हीं के मन में उत्पन्न हुई। अतएव इस परिवर्तनशील जगत् से परे अपरिवर्तित की कल्पना भी उन्होंने ही की’। लिखा है:
‘‘इसके बाद मृत्यु रूपी भयानक तथ्य आता है, सारा संसार मृत्यु के मुख में चला जा रहा है, सभी मरते जा रहे हैं। हमारी उन्नति हमारे व्यर्थ के आडम्बरपूर्ण कार्य-कलाप, समाज-संस्कार, विलासिता-ऐश्वर्य, ज्ञान-इन सबकी मृत्यु ही एकमात्र गति है। इससे अधिक निश्चित बात और कुछ नहीं। नगर पर नगर बनते हैं और नष्ट हो जाते हैं,
की इच्छा भी उन्हीं के मन में उत्पन्न हुई। अतएव इस परिवर्तनशील जगत् से परे अपरिवर्तित की कल्पना भी उन्होंने ही की’। लिखा है:
‘‘इसके बाद मृत्यु रूपी भयानक तथ्य आता है, सारा संसार मृत्यु के मुख में चला जा रहा है, सभी मरते जा रहे हैं। हमारी उन्नति हमारे व्यर्थ के आडम्बरपूर्ण कार्य-कलाप, समाज-संस्कार, विलासिता-ऐश्वर्य, ज्ञान-इन सबकी मृत्यु ही एकमात्र गति है। इससे अधिक निश्चित बात और कुछ नहीं। नगर पर नगर बनते हैं और नष्ट हो जाते हैं,