जानना कि धर्म का आरम्भ ही नहीं हुआ। इस मत करना ही से निवृत्िा का भाव आ गया, और परस्पर युद्व में रत देवतागण आराधित होने के बावजुद मनुष्य की धारणाएं विकसित होने लगी।’’ (द्वितीय खंड, पृष्ठ 63)
सम्पत्िा स्वामियों को सारी सुविधाएं प्राप्त थी। उन्हें हाथ से कुछ काम तो करना नहीं था, दिमाग से सिर्फ सोचना ही था। सुख की भावना के अनुपात ही से उनके मन में दुख की भावना भी बढ़ी। मृत्यु के भय ने सबसे पहले उन्हीं को परेशान किया और अमरत्व
जानना कि धर्म का आरम्भ ही नहीं हुआ। इस मत करना ही से निवृत्िा का भाव आ गया, और परस्पर युद्व में रत देवतागण आराधित होने के बावजुद मनुष्य की धारणाएं विकसित होने लगी।’’ (द्वितीय खंड, पृष्ठ 63)
सम्पत्िा स्वामियों को सारी सुविधाएं प्राप्त थी। उन्हें हाथ से कुछ काम तो करना नहीं था, दिमाग से सिर्फ सोचना ही था। सुख की भावना के अनुपात ही से उनके मन में दुख की भावना भी बढ़ी। मृत्यु के भय ने सबसे पहले उन्हीं को परेशान किया और अमरत्व