फिर भी जीवन के प्रति यह विषम आसक्ति विद्यमान है। हम क्यों इस जीवन से आसक्ति करते हैं? क्यों हम इसका परित्याग नहीं कर पाते। यह हम नहीं जानते। और यही माया है।’’ (द्वितीय खंड, पृष्ठ 47)
ठसी से ‘जगत् मिथ्या और ब्रह्म सत्य’ के दर्शन का उदय हुआ। मायावाद के इस सिद्वान्त पर हम बाद में विचार करेंगे।
और लिखा है कि ‘जिस समय सर्वप्रथम गीता का उपदेश दिया गया, उस समय दो सम्प्रदायों में बड़ा वाद-विवाद चल रहा था। इनमें से एक सम्प्रदाय वैदिक यज्ञों,
फिर भी जीवन के प्रति यह विषम आसक्ति विद्यमान है। हम क्यों इस जीवन से आसक्ति करते हैं? क्यों हम इसका परित्याग नहीं कर पाते। यह हम नहीं जानते। और यही माया है।’’ (द्वितीय खंड, पृष्ठ 47)
ठसी से ‘जगत् मिथ्या और ब्रह्म सत्य’ के दर्शन का उदय हुआ। मायावाद के इस सिद्वान्त पर हम बाद में विचार करेंगे।
और लिखा है कि ‘जिस समय सर्वप्रथम गीता का उपदेश दिया गया, उस समय दो सम्प्रदायों में बड़ा वाद-विवाद चल रहा था। इनमें से एक सम्प्रदाय वैदिक यज्ञों,