पशुबलि तथा इसी प्रकार का अन्याय कर्मों की का धर्म का सार-सर्वस्व समझता था। दूसरे का विश्वास था कि समस्त कर्मों का त्याग और आत्मज्ञान की उपलब्धि ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है।’’ दरअसल यह भौतिकवादियों और आदर्शवादियों (प्कमंसपेजे) का वाद-विवाद था। वैदिक युग से चले आ रहे भौतिकवादी विचारकों के सूक्ष्म चिंतन की अवहेलना करके उन्हें स्ािूल रूप से यज्ञ तथा पशुबलि इत्यादि कर्मकाण्ड के प्रतिनिधि बताया गया है। जो लोग सुख-सुविधा तथा विलासिता का
पशुबलि तथा इसी प्रकार का अन्याय कर्मों की का धर्म का सार-सर्वस्व समझता था। दूसरे का विश्वास था कि समस्त कर्मों का त्याग और आत्मज्ञान की उपलब्धि ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है।’’ दरअसल यह भौतिकवादियों और आदर्शवादियों (प्कमंसपेजे) का वाद-विवाद था। वैदिक युग से चले आ रहे भौतिकवादी विचारकों के सूक्ष्म चिंतन की अवहेलना करके उन्हें स्ािूल रूप से यज्ञ तथा पशुबलि इत्यादि कर्मकाण्ड के प्रतिनिधि बताया गया है। जो लोग सुख-सुविधा तथा विलासिता का