योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

लड़ रहे थे अतएव जिस ‘बल’ शब्द पर उन्होंने बहुत ज़ोर दिया है, इससे पहले शिष्य के साथ एक वार्ता में उन्होंने इसकी व्याख्या यों की:

‘‘तुम्हारे देश के लोगों का खून मानो हृदय में जम गया है-नसों में मानो रक्त का प्रवाह की रूक गया। सर्वांग पक्षाघात के कारण शिथिल-सा हो गया है। इसलिए मैं रजोगुण की वृद्वि कर कर्म तत्परता के द्वारा इस देश के लोगों का पहले इहलौकिक जीवन संग्राम के लिए समर्थ बनाना चाहता हूं। देह में शक्ति नहीं, हृदय में उत्साह नहीं,


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लड़ रहे थे अतएव जिस ‘बल’ शब्द पर उन्होंने बहुत ज़ोर दिया है, इससे पहले शिष्य के साथ एक वार्ता में उन्होंने इसकी व्याख्या यों की:

‘‘तुम्हारे देश के लोगों का खून मानो हृदय में जम गया है-नसों में मानो रक्त का प्रवाह की रूक गया। सर्वांग पक्षाघात के कारण शिथिल-सा हो गया है। इसलिए मैं रजोगुण की वृद्वि कर कर्म तत्परता के द्वारा इस देश के लोगों का पहले इहलौकिक जीवन संग्राम के लिए समर्थ बनाना चाहता हूं। देह में शक्ति नहीं, हृदय में उत्साह नहीं,


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