मस्तिष्क में प्रतिभा नहीं। क्या होगा रे इन जड़पिंडों से? मैं हिला-डुलाकर स्पंदन लाना चाहता हूं। इसलिए मैंने प्राणान्त प्रण किया है-वेदान्त के अमोघ मत्र के बल से इन्हें जगाऊंगा। ‘उतिष्ठत जाग्रत’ (उठो, जागो)-इस अभयवाणी को सुनाने ही के लिए मेरा जन्म हुआ है। तुम लोग इस काम में मेरे सहायक बनो। जा गांव-गांव में, देश-देश में, यह अभय वाणी चांडाल से लेकर ब्राह्मण तक को सुना आ। सभी को पकड़-पकड़कर जाकर कह दे-‘तुम लोग अमित वीर्यवान
मस्तिष्क में प्रतिभा नहीं। क्या होगा रे इन जड़पिंडों से? मैं हिला-डुलाकर स्पंदन लाना चाहता हूं। इसलिए मैंने प्राणान्त प्रण किया है-वेदान्त के अमोघ मत्र के बल से इन्हें जगाऊंगा। ‘उतिष्ठत जाग्रत’ (उठो, जागो)-इस अभयवाणी को सुनाने ही के लिए मेरा जन्म हुआ है। तुम लोग इस काम में मेरे सहायक बनो। जा गांव-गांव में, देश-देश में, यह अभय वाणी चांडाल से लेकर ब्राह्मण तक को सुना आ। सभी को पकड़-पकड़कर जाकर कह दे-‘तुम लोग अमित वीर्यवान