योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

उन्हें साम्राज्यवाद से घृणा थी और वे देश की उत्पीड़ित, शोषित जनता को उठाना, जगाना चाहते थे, इसलिए उनका आध्यात्मिक अद्वैतवाद की चरम सीमा का अतिक्रमण करना-विराम चिहृ को लांघना स्वाभाविक था। अतएवः हम उन्हें सैनफ्रांसिस्को के उक्त भाषण में कहते हुए सुनते हैं:

‘‘बाह्म और आन्तरिक प्रकृतियां दो भिन्न वस्तु नहीं हैं, वे एक हैं, वे एक हैं। प्रकृति समस्त घटनाओं की समष्टि है ‘प्रकृति’ से आशय है-वह सब जो है, वह सब जो गतिशील है।


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उन्हें साम्राज्यवाद से घृणा थी और वे देश की उत्पीड़ित, शोषित जनता को उठाना, जगाना चाहते थे, इसलिए उनका आध्यात्मिक अद्वैतवाद की चरम सीमा का अतिक्रमण करना-विराम चिहृ को लांघना स्वाभाविक था। अतएवः हम उन्हें सैनफ्रांसिस्को के उक्त भाषण में कहते हुए सुनते हैं:

‘‘बाह्म और आन्तरिक प्रकृतियां दो भिन्न वस्तु नहीं हैं, वे एक हैं, वे एक हैं। प्रकृति समस्त घटनाओं की समष्टि है ‘प्रकृति’ से आशय है-वह सब जो है, वह सब जो गतिशील है।


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