या भौतिकता इन दोनों में किसी एक को मानने के सिवा और कोई गति नहीं है। प्रश्न यह है कि हम किसे मानें?’’
इस प्रश्न चिहृ पर विचार कीजिए। क्या एक संन्यासी, एक धर्म-प्रचारक के लिए यह साहस की बात नहीं है?
23 मार्च, 1900 को सनफ्रांसिस्को में ‘जीवात्मा एवं परमात्मा’ शीर्षक भाषण में उन्होंने कहा:
‘‘दो प्रकार की जातियां हैं-दैवी सम्पदावली और आसुरी सम्पदावाली। पहली का विचार है कि वे स्वयं जीवात्मा तथा परमात्मा के स्वरूप हैं।
या भौतिकता इन दोनों में किसी एक को मानने के सिवा और कोई गति नहीं है। प्रश्न यह है कि हम किसे मानें?’’
इस प्रश्न चिहृ पर विचार कीजिए। क्या एक संन्यासी, एक धर्म-प्रचारक के लिए यह साहस की बात नहीं है?
23 मार्च, 1900 को सनफ्रांसिस्को में ‘जीवात्मा एवं परमात्मा’ शीर्षक भाषण में उन्होंने कहा:
‘‘दो प्रकार की जातियां हैं-दैवी सम्पदावली और आसुरी सम्पदावाली। पहली का विचार है कि वे स्वयं जीवात्मा तथा परमात्मा के स्वरूप हैं।