दर्शन पारिवारिक परम्परा थी। इस विषय में उसके गुरू भाई स्वामी सारदानन्द ने अपनी पुस्तक ‘श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग’ में लिखा है:
‘‘बड़े होने पर परीक्षा के दो-तीन मास पहले वे अपनी पाठ्य-पुस्तकों को पढ़ना आरम्भ करते थे, अन्य समय अपनी इच्छा के अनुसार दूसरी पुस्तकें पढ़कर समय बिताते थे। इस प्रकार मैट्रिक परीक्षा देने के पहले उन्होंने अंगे्रजी और बंगला के अनेक साहित्यिक तथा ऐतिहासिक गं्रथ पढ़ डाले थे। फलतः परीक्षा के पूर्व उन्हें
दर्शन पारिवारिक परम्परा थी। इस विषय में उसके गुरू भाई स्वामी सारदानन्द ने अपनी पुस्तक ‘श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग’ में लिखा है:
‘‘बड़े होने पर परीक्षा के दो-तीन मास पहले वे अपनी पाठ्य-पुस्तकों को पढ़ना आरम्भ करते थे, अन्य समय अपनी इच्छा के अनुसार दूसरी पुस्तकें पढ़कर समय बिताते थे। इस प्रकार मैट्रिक परीक्षा देने के पहले उन्होंने अंगे्रजी और बंगला के अनेक साहित्यिक तथा ऐतिहासिक गं्रथ पढ़ डाले थे। फलतः परीक्षा के पूर्व उन्हें