कच्चे नगीने नहीं हैं।'
जालपा-'कुछ भी हो, छः सौ से ज्यादा का नहीं।'
रमानाथ-'और रिंग का? '
जालपा-'अधिक से अधिक सौ रूपये! '
रमानाथ-'यहां भी चूकीं, डेढ़सौ मांगता है।'
जालपा-'जट्टू है कोई, हमें इन दामों लेना ही नहीं।
रमा की चाल उल्टी पड़ी, जालपा को इन चीज़ों के मूल्य के विषय में बहुत धोखा न हुआ था। आख़िर रमा की आर्थिक दशा तो उससे छिपी न थी, फिर वह सात सौ रूपये की चीजों के लिए मुंह खोले बैठी थी। रमा को क्या मालूम
कच्चे नगीने नहीं हैं।'
जालपा-'कुछ भी हो, छः सौ से ज्यादा का नहीं।'
रमानाथ-'और रिंग का? '
जालपा-'अधिक से अधिक सौ रूपये! '
रमानाथ-'यहां भी चूकीं, डेढ़सौ मांगता है।'
जालपा-'जट्टू है कोई, हमें इन दामों लेना ही नहीं।
रमा की चाल उल्टी पड़ी, जालपा को इन चीज़ों के मूल्य के विषय में बहुत धोखा न हुआ था। आख़िर रमा की आर्थिक दशा तो उससे छिपी न थी, फिर वह सात सौ रूपये की चीजों के लिए मुंह खोले बैठी थी। रमा को क्या मालूम