गबन - Gaban

था कि जालपा कुछ और ही समझकर कंगन पर लहराई थी। अब तो गला छूटने का एक ही उपाय था और वह यह कि दलाल छः सौ पर राज़ी न हो बोला, 'वह साढ़े आठ से कौड़ी कम न लेगा।'

जालपा-'तो लौटा दो।'

रमानाथ-'मुझे तो लौटाते शर्म आती है। अम्मां, ज़रा आप ही दालान में चलकर कह दें, हमें सात सौ से ज्यादा नहीं देना है। देना होता तो दे दो, नहीं चले जाओ।'

जागेश्वरी--'हां रे, क्यों नहीं, उस दलाल से मैं बातें करने जाऊं! '

जालपा-'तुम्हीं क्यों नहीं कह देते, इसमें तो कोई शर्म की बात नहीं।'


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था कि जालपा कुछ और ही समझकर कंगन पर लहराई थी। अब तो गला छूटने का एक ही उपाय था और वह यह कि दलाल छः सौ पर राज़ी न हो बोला, 'वह साढ़े आठ से कौड़ी कम न लेगा।'

जालपा-'तो लौटा दो।'

रमानाथ-'मुझे तो लौटाते शर्म आती है। अम्मां, ज़रा आप ही दालान में चलकर कह दें, हमें सात सौ से ज्यादा नहीं देना है। देना होता तो दे दो, नहीं चले जाओ।'

जागेश्वरी--'हां रे, क्यों नहीं, उस दलाल से मैं बातें करने जाऊं! '

जालपा-'तुम्हीं क्यों नहीं कह देते, इसमें तो कोई शर्म की बात नहीं।'


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