जालपा-'माल बेचने आते हो, या जटने आते हो? सात सौ रूपये कंगन के मांगते हो? '
चरनदास-'सात सौ तो उसकी कारीगरी के दाम हैं, हूजूर! '
जालपा-'अच्छा तो जो उस पर सात सौ निछावर कर दे, उसके पास ले जाओ। रिंग के डेढ़सौ कहते हो, लूट है क्या? मैं तो दोनों चीज़ों के सात सौ
से अधिक न दूंगी।
चरनदास-'बहूजी, आप तो अंधेर करती हैं। कहां साढ़े आठ सौ और कहां सात सौ? '
जालपा-'तुम्हारी खुशी, अपनी चीज़ ले जाओ।'
चरनदास-'इतने बडे दरबार
जालपा-'माल बेचने आते हो, या जटने आते हो? सात सौ रूपये कंगन के मांगते हो? '
चरनदास-'सात सौ तो उसकी कारीगरी के दाम हैं, हूजूर! '
जालपा-'अच्छा तो जो उस पर सात सौ निछावर कर दे, उसके पास ले जाओ। रिंग के डेढ़सौ कहते हो, लूट है क्या? मैं तो दोनों चीज़ों के सात सौ
से अधिक न दूंगी।
चरनदास-'बहूजी, आप तो अंधेर करती हैं। कहां साढ़े आठ सौ और कहां सात सौ? '
जालपा-'तुम्हारी खुशी, अपनी चीज़ ले जाओ।'
चरनदास-'इतने बडे दरबार