रमानाथ-'डेढ़सौ! इतना फजूल-ख़र्च मैं नहीं हूं।'
जालपा-'डेढ़सौ से कम की ये चीज़ें नहीं हैं।'
जालपा ने घड़ी कलाई में बांधा ली और साड़ी को खोलकर मंत्रमुग्ध नजरों से देखा।
रमानाथ-'तुम्हारी कलाई पर यह घड़ी कैसी खिल रही है! मेरे रूपये वसूल हो गए।
जालपा-'सच बताओ, कितने रूपये ख़र्च हुए?
रमानाथ-'सच बता दूं- एक सौ पैंतीस रूपये। पचहत्तर रूपये की साड़ी, दस के जूते और पचास की घड़ी।'
जालपा-'यह डेढ़सौ ही हुए। मैंने कुछ बढ़ाकर थोड़े कहा था,
रमानाथ-'डेढ़सौ! इतना फजूल-ख़र्च मैं नहीं हूं।'
जालपा-'डेढ़सौ से कम की ये चीज़ें नहीं हैं।'
जालपा ने घड़ी कलाई में बांधा ली और साड़ी को खोलकर मंत्रमुग्ध नजरों से देखा।
रमानाथ-'तुम्हारी कलाई पर यह घड़ी कैसी खिल रही है! मेरे रूपये वसूल हो गए।
जालपा-'सच बताओ, कितने रूपये ख़र्च हुए?
रमानाथ-'सच बता दूं- एक सौ पैंतीस रूपये। पचहत्तर रूपये की साड़ी, दस के जूते और पचास की घड़ी।'
जालपा-'यह डेढ़सौ ही हुए। मैंने कुछ बढ़ाकर थोड़े कहा था,