गबन - Gaban

कि कहते लज्जा आती है। तुम घड़ी-आधा घड़ी के लिए रोज़ चली आया करो बहन।'

जालपा-'वाह इससे अच्छा और क्या होगा.'

रतन-'मैं मोटर भेज दिया करूंगी।'

जालपा-'क्या जरूरत है। तांगे तो मिलते ही हैं।'

रतन-'न-जाने क्यों तुम्हें छोड़ने को जी नहीं चाहता। तुम्हें पाकर रमानाथजी अपना भाग्य सराहते होंगे।'

जालपा ने मुस्कराकर कहा, 'भाग्य-वाग्य तो कहीं नहीं सराहते, घुड़कियां जमाया करते हैं।'

रतन-'सच! मुझे तो विश्वास नहीं आता। लो, वह भी तो आ गए। पूछना,ऐसा दूसरा कंगन बनवा देंगे।'


285 of 1203

कि कहते लज्जा आती है। तुम घड़ी-आधा घड़ी के लिए रोज़ चली आया करो बहन।'

जालपा-'वाह इससे अच्छा और क्या होगा.'

रतन-'मैं मोटर भेज दिया करूंगी।'

जालपा-'क्या जरूरत है। तांगे तो मिलते ही हैं।'

रतन-'न-जाने क्यों तुम्हें छोड़ने को जी नहीं चाहता। तुम्हें पाकर रमानाथजी अपना भाग्य सराहते होंगे।'

जालपा ने मुस्कराकर कहा, 'भाग्य-वाग्य तो कहीं नहीं सराहते, घुड़कियां जमाया करते हैं।'

रतन-'सच! मुझे तो विश्वास नहीं आता। लो, वह भी तो आ गए। पूछना,ऐसा दूसरा कंगन बनवा देंगे।'


285 of 1203