अलंकार - Alankar

बैठी हुई थी और ऐसा विदित होता था कि वह परेम की व्याख्या कर रहे हैं। वेश्या की मुखश्री मनोहर और अपिरतम थी। उन पर जो अग्नि की वर्षा हो रही थी वह ओस की बूंदों के समान सुखद और शीतल थी, और वह झुलसती हुई भूमि उनके पैरों से कोमल तृण के समान दब जाती थी। यह देखकर पापनाशी की क्रोधाग्नि जोर से भड़क उठी। उसने चिल्लाकर कहा-ईश्वर, इस दुराचारी पर वजरघात कर ! यह निसियास है। उसे ऐसा कुचल कि वह रोये, कराहे और क्रोध से दांत पीसे। उसने थायस को भरष्ट किया है।


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बैठी हुई थी और ऐसा विदित होता था कि वह परेम की व्याख्या कर रहे हैं। वेश्या की मुखश्री मनोहर और अपिरतम थी। उन पर जो अग्नि की वर्षा हो रही थी वह ओस की बूंदों के समान सुखद और शीतल थी, और वह झुलसती हुई भूमि उनके पैरों से कोमल तृण के समान दब जाती थी। यह देखकर पापनाशी की क्रोधाग्नि जोर से भड़क उठी। उसने चिल्लाकर कहा-ईश्वर, इस दुराचारी पर वजरघात कर ! यह निसियास है। उसे ऐसा कुचल कि वह रोये, कराहे और क्रोध से दांत पीसे। उसने थायस को भरष्ट किया है।


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